Tuesday, May 13, 2025

Different terms for a love bond

Different terms for a love bond include affection, devotion, passion, intimacy, and appreciation, among others. Some more evocative terms include "amour," "fondness," and "head over heels". Additionally, phrases like "you mean the world to me" and "apple of one's eye" can express a strong love bond. 
 
Here's a more detailed breakdown:
  • Affection: A feeling of fondness or liking.
  • Devotion: Strong love, loyalty, or commitment.
  • Passion: Intense, strong love or feeling.
  • Intimacy: A feeling of closeness and connectedness.
  • Appreciation: A feeling of gratitude or admiration.
  • Fondness: A feeling of warm affection. 
More evocative terms:
  • Amour: A romantic love affair, especially a secret one. 
  •  Amour: A romantic love affair, especially a secret one. 
  • Head over heels: Extremely in love. 
  • Apple of one's eye: Someone who is very precious and loved. 
  • Bae: A shortened form of "before anyone else," used to refer to a loved one. 
Phrases:
  • You mean the world to me: Expressing immense love and importance.
  •  I can't stop thinking about you: Showing intense affection and longing.
  • You hold a place in my heart that no one else can touch: Expressing a unique and irreplaceable love. 
  • Saturday, May 10, 2025

    भारतीय भाषाओँ के विरुद्ध षड़यंत्र : भारत का सांस्कृतिक पतन

     भारतीय भाषाओँ के विरुद्ध षड़यंत्र : भारत का सांस्कृतिक पतन

    (Lekhak ki jankari nahi hai)

    4 मार्च 2013 पर 06:55 अपराह्न


     

    ऋषि भूमि, राम भूमि, कृष्ण भूमि, तथागत की भूमि... भारत के गौरवशाली अतीत को यदि शब्दों में एवं वाणी में कालांतर तक भी बांधने का प्रयास किया जाए तो संभव नहीं है। वर्तमान में पश्चिम का अंधानुकरण करने से जो भारत का सांस्कृतिक पतन हुआ है वह निश्चय मानिए आपके प्रयासों से समाप्त होगा। इस पश्चिम के अंधानुकरण एवं मानसिक परतंत्रता के रोग के उपचार हेतु इसका कारण प्रभाव आदि जानना भी नितांत आवश्यक है।

     

    भारत पर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से २०० से २५० वर्षों तक अंग्रेजो का शासन रहा, अल्पावधि तक फ्रांसीसियों एवं डच आक्रान्ताओं का प्रभाव भी रहा। भारत के कुछ भूभागो केरल, गोवा (मालाबार का इलाका आदि ) पर तो, पुर्तगालियों का ४००–४५० वर्षों तक शासन रहा।

     

    भारत पर ७–८ शताब्दी से आक्रमण प्रारंभ हो गए थे। मोहाम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, तैमूर लंग, अहमद शाह अफदाली, बाबर एवं उसके कई वंशज इन आक्रांताओं का भी शासनकाल अथवा प्रभावयुक्त कालखंड कोई बहुत अच्छा समय नहीं रहा भारत के लिए, सांस्कृतिक एवं सभ्यता की दृष्टि से।

     

    भिन्न भिन्न आक्रांताओ के शासनकाल में भारत में सांस्कृतिक एवं सभ्यता की दृष्टि से कुछ परिवर्तन हुए। कुछ परिवर्तन तो तात्कालिक थे जो समय के साथ ठीक हो गए, लेकिन कुछ स्थाई हो गए। जब तक भारत पर आक्रांताओ का शासन था तब तक हम पर परतंत्रता थी। सन १९४७ की तथाकथित सत्ता के हस्तांतरण के उपरांत शारीरिक परतंत्रता तो एक प्रकार से समाप्त हो गई किंतु मानसिक परतंत्रता से अब भी हम जूझ रहे है। यह अपनी सभ्यता एवं संस्कृति के लिए जुझारूपन हमारे रक्त में है, जो कभी सपाप्त नहीं हो सकता। इसी के कारण हमारी वर्तमान संस्कृति में अधकचरापन आ गया है "न पूरी ताकत से विदेशी हो पाए, न पूरी ताकत से भारतीय हो पाए, हम बीच के हो गए, खिचड़ी हो गए" !!

     

    भारतीय भाषाओँ के विरुद्ध एक षड़यंत्र -

     

    एक सबसे बड़ा विकार स्थानीय भाषा एवं बोली के पतन के रूप में आया। हम आसाम में, बंगाल में, गुजरात में, महाराष्ट्र में रहते है वही की बोली बोलते है, लिखते है, समझते है परंतु सब सरकारी कार्य हेतु अंग्रेजी ओढ़नी पड़ती है। यह विदेशीपन, अंग्रेजीपन के कारण और भी भयावह स्थिति का तब निर्माण होता है जब नन्हे नन्हे बालको को कान उमेठ-उमेठ कर अंग्रेजी रटाई जाती है। सरकार के आकड़ो के अनुसार जब प्राथमिक स्तर पर १८ करोड़ भारतीय छात्र विद्यालय में प्रथम कक्षा में प्रवेश लेते है तो अंतिम कक्षा जैसे उच्च शिक्षा जैसे अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग), चिकित्सा (मेडिकल), संचालन (मैनेजमेंट) आदि तक पहुँचते-२ तो १७ करोड़ छात्र/छात्राएं अनुतीर्ण हो जाते है, केवल १ करोड़ उत्तीर्ण हो पाते है। भारत सरकार ने समय समय पर शिक्षा पर शोध एवं अनुसंधान के लिए मुख्यतः तीन आयोग बनाए दौलत सिंह कोठारी, आचार्य राममूर्ति एवं एक और... सभी का यही मत था की यदि भारत में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा व्यवस्था न हो अपितु शिक्षा स्थानीय एवं मातृभाषा में हो तो यह जो १८ करोड़ छात्र है, सब के सब उत्तीर्ण हो सकते है, उच्चतम स्तर तक।

     

    विचार कर देखें शिक्षा मातृभाषा में नहीं होने का कितना अधिक दुष्परिणाम उन १७ करोड़ विद्यार्थियों को भोगना पड़ता है, इनमें से आधे से अधिक तो शुरुआत में ही बाहर हो जाते कोई पांचवीं में तो कोई सातवीं में कुछ ८-८.५ करोड़ विद्यार्थी इस व्यवस्था के कारण सदैव के लिए बाहर हो जाते है। यह कैसे दुर्व्यवस्था है जो प्रतिवर्ष १७ करोड़ का जीवन अंधकारमय बना देती है। अगर आप प्रतिशत में देखे तो ९५% सदैव के लिए बाहर हो रहे है। यह सब विदेशी भाषा को ओढ़ने के प्रयास के कारण, बात मात्र विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने की नहीं अपितु व्यवस्था की है।

     

    दुर्भाग्य की पराकाष्ठा तो देखिये की जब कोई रोगी जब चिकित्सक के पास जाता है तो वह चिकित्सक उसे पर्ची पर दवाई लिख के देता है, मरीज उसे पढ़ नहीं सकता वरन कोई विशेषज्ञ ही पढ़ सकता है। कितना बड़ा दुर्भाग्य है उस रोगी का की जो दवा उसको दी जा रही है, जो वह अपने शरीर में डाल रहा है, उसे स्वयं न पढ़ सकता न जान नहीं सकता की वह दवा क्या है ? उसका दुष्परिणाम क्या हो सकता है उसके शरीर पर ? यदि वह जोर दे कर जानना भी चाहे तो डाक्टर उसे अंग्रेजी भाषा में बोल देगा, लिख देगा उसे समझने हेतु उसे किसी और विशेषज्ञ के पास जाना होगा।

     

    क्योँ बंगाल में, असम में, गुजरात में, महाराष्ट्र में, हिंदी भाषी राज्यों आदि में दवाइयों का नाम क्रमषः बंगला में, असमिया में, गुजरती में, मराठी में, हिंदी में आदि में नहीं है। यह बिलकुल संभव एवं व्यावहारिक है। संविधान जिन २२-२३ भाषओं को मान्यता देता है उनमें क्योँ नही ? राष्ट्रीय भाषा हिंदी (हम मानते है) में क्यों नहीं जिसे समझने वाले ८० से ८५ करोड़ है और तो और सरकार ने नियम बना रखा है दवाइयों के नाम लिखे अंग्रेजी में, चिरभोग (प्रिस्किप्शन) लिखे अंग्रेजी में, छापे अंग्रेजी में आदि। जिस भाषा (अंग्रेजी) को कठिनाई से १ से २ प्रतिशत लोग जानते है।

     

     

    ऐसा ही सत्यानाश हमने न्याय व्यवस्था का कर रखा है, उदाहरण : मान लीजिए मैं असम का व्यक्ति हूँ मुझे कुछ न्याय संबंधित परेशानी है तो पहले असमियां में वकील को समझाओ, वकील भाषांतर करे अंग्रेजी में उपरांत वह जज को समझाए। जज विचार कर अंग्रेजी में वकील को समाधान सुनाये, वकील अंग्रेजी का भाषांतर करे असमियां में, उपरांत मुझे समझावे... अरे भाई क्या सत्यानाश कर रखा है। इन सब में कितना समय एवं शक्ति की नष्ट हो रही है अगर यह भाषा की परतंत्रता नहीं होती तो मैं सीधे अपनी दुविधा, परेशानी न्यायाधीश को असमिया में बता देता और वह उसका समाधान कर मुझे बता देता। किसी तीसरे व्यक्ति (न्यायज्ञ) की आवश्यकता ही नहीं पड़ती भाषांतर के लिए।

     

    बच्चों का निजी एवं कान्वेंट विद्यालयों में पिता माता के अंग्रेजी नहीं आने के कारण प्रवेश नहीं मिल पाना, किससे छिपा है ? आपका बालक कितना ही मेधावी क्योँ न हो अगर माता पिता को अंग्रेजी न आती हो तो, उन्हें निर्लज्जता के साथ कह दिया जाता है आप किसी और भाषा का विद्यालय खोज ले एवं बालक/बलिका को प्रवेश नहीं दिया जाता। ऐसे कान्वेंट विद्यालयों का तर्क होता है की अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती तो जो गृहकार्य हम बच्चे को देंगे उसमें आप कैसे सहायता करेंगे ? इसी अन्याय के कारण करोड़ो-करोड़ो बच्चे इन विद्यालयों में केवल इस लिए नहीं जा पाते क्यूंकि उनके माता पिता को अंग्रेजी नहीं आती और अगर कभी प्रवेश हो ही जाता है तो मात्र अंग्रेजी नहीं आने के कारण उसमें कम अंक प्राप्ति के कारण विद्यार्थियों का समूल प्रतिशत घट जाता है एवं कभी कभी तो पुनः सभी विषयों की तयारी करनी पड़ती है।

     

     

     

    अंग्रेजी कोई इतनी बड़ी भाषा नहीं है, जैसी की हमारे मन में उसकी छद्म छवि है, विश्व के मात्र १४ देशों में अंग्रेजी चलती है एवं यह वही देश है जो अंग्रेजो के परतंत्र रहे है।

     

    इनके इन देशों में अंग्रेजी का स्वयं विकास नहीं हुआ है परतंत्रता के कारण इन्हें इसके लिए बाध्य होना पड़ा। विश्व की प्रमुख संस्थाए अंग्रेजी में कार्य नहीं करती, बहुत से देशों के लोग तो अंग्रेजी जानते हुए भी उसमें बात करना पसंद नहीं करते। जर्मनी में जर्मन में, फ़्रांस में फ्रेंच में, स्पेन में स्पेनिश में, जापान में जापानी में, चीन में चीनी में आदि देशों में अपनी भाषा में ही सरकारी कार्य भी किया जाता है। अंग्रेजी से निजात ही अच्छी है क्यूंकि इसमें हमारा विकास नहीं, मुक्ति नहीं।

     

    संयुक्त राष्ट्र महासंघ के मानवीय विकास के लेखे जोखे में भारत लगभग १३४ में आता है, बहुत से भारत से भी छोटे छोटे देश जो इस लेखे-जोखे में भारत से ऊपर आते है क्यूंकि उनमें अधिकांश अपनी मातृभाषा में कार्य करते है। स्वयं संयुक्त राष्ट्र भी फ्रेंच भाषा में कार्य करता है अंग्रेजी में तो वह अपने कार्यों का भाषांतर करता है अधिकांश भाषा विशेषज्ञ भी कहते है अंग्रेजी व्यकरण की दृष्टि से भी बहुत बुरी है।

     

    भारत की सभी २२-२३ मातृभाषाएँ जो संविधान में स्वीकृत है, बहुत सबल है। उनमें से भी यदि सबसे छोटी भाषा को अंग्रेजी से तुलना करे तो वह भी अंग्रेजी से बड़ी है। उत्तर प्रांत के जो राज्य है, मणिपुर, नागालैण्ड, मिजोरम आदि उनमें जो सबसे छोटी भाषा एव बोलियां चलती है उनमें से भी सबसे छोटी भाषा है उसमें भी अंग्रेजी से अधिक शब्द है। जब सबसे छोटी भाषा भी अंग्रेजी से बड़ी है तो हम अंग्रेजी को क्यूँ पाल रहे है एवं हमारी सबसे बड़ी भाषा तो अंग्रेजी से कितनी बड़ी होगी। तकनिकी शब्द जो है न हम चाहे तो तात्कालिक रूप से जैसे के तैसे अंग्रेजी ले सकते।

     

    लेकिन विचार की जो अभिव्यक्ति है वह मातृभाषा, बोलियों में कर थोड़े दिन में तकनीकी शब्दों को भी हर मातृभाषा में ला सकते है। कुछ परेशानी नहीं है और तो और हमारे पास माँ (संस्कृत) भी है उसका भी उपयोग किया जा सकता है। संस्कृत के शब्द तो सभी भाषओं में मिल जाते है।

    Saturday, May 3, 2025

    Best way to handle your wifes extra marital affair with other man or women.

    Dealing with an extramarital affair can be incredibly challenging and emotional. Here are some steps you might consider:

    1. Acknowledge Your Feelings: Recognize how you feel and give yourself permission to process those emotions.

    2. Open Communication: If you're ready, consider having an open and honest conversation with your wife about your feelings and concerns.

    3. Seek Professional Help: Couples therapy can provide a safe space to explore the issues and work on rebuilding trust if both parties are willing.

    4. Self-Care: Take care of your physical and emotional well-being during this time. Engage in activities that bring you comfort and support.

    5. Evaluate the Relationship: Reflect on what you want for your future and whether this relationship aligns with those desires.

    Every situation is unique, and it's essential to prioritize your well-being and make decisions that are best for you.

    Handling comfort zone of your wife with other man.


    Handling situations involving your wife's comfort zone with other men requires empathy, understanding, and open communication. Here are some steps you can consider:

    1. Open Communication: Talk to your wife about how you feel and why you're concerned. Use "I" statements to express your feelings without blaming or accusing her.

    2. Understand Boundaries: Discuss and establish boundaries that both of you are comfortable with regarding interactions with others.

    3. Trust and Respect: Build trust by being reliable, honest, and respectful. Trust is crucial in any relationship.

    4. Empathy and Understanding: Try to understand her perspective and feelings. Empathy can help strengthen your bond.

    5. Professional Help: If you're finding it difficult to navigate these issues on your own, consider seeking help from a relationship counselor or therapist.

    Every relationship is unique, so it's essential to find what works best for both of you.

    Wednesday, April 30, 2025

    Sanp Chitti Sidhant

     "When Snake is alive, Snake eats Ants. When Snake is dead, Ants eat Snake. Time can turn at any time. Don't neglect anyone in your life."

    Ydsup - Achal Sampattis

     Achal Sampattis

    A Unit Of Shree Yds-Udyam Pratisthaan  


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    Monday, February 24, 2025